
नौगांव। एक सदी पुरानी परंपरा, नौगांव का प्रसिद्ध मेला, आज विवाद और राजनीति के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। सांस्कृतिक धरोहर और सामूहिक आनंद का यह पर्व, जो हर वर्ग के लोगों के लिए राहत और मनोरंजन का जरिया रहा है, अब स्वार्थ और सत्ता के संघर्ष का शिकार बन रहा है।मेला: उत्सव से विवाद तक का सफरसाल 1934 में नगर पालिका गठन के बाद इस मेले ने शहर की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दी। हर वर्ष लगभग 700 दुकानों और झूलों के आवंटन की प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता और नियमबद्धता से की जाती है। यह मेला न केवल व्यापारियों और आम जनता का मेलजोल सुनिश्चित करता है, बल्कि बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के लिए मनोरंजन का एक विशेष अवसर भी होता है। लेकिन इस बार, झूलों के आवंटन को लेकर खड़ा हुआ विवाद इस आयोजन की गरिमा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।झूलों की राजनीति: विश्वास पर चोटमेला आयोजन के केंद्र में झूलों का आवंटन हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। झूला संचालकों के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं ताकि अव्यवस्था और विवाद से बचा जा सके।लेकिन इस वर्ष विवाद के प्रमुख बिंदु हैं1. झूलों का अव्यवस्थित आवंटन: जिन झूला संचालकों ने नगर पालिका को अब तक औपचारिक आवेदन नहीं दिया, वे अब प्रभावशाली लोगों के माध्यम से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।2. पुरानी रंजिशों का असर: पूर्व में झूलों को लेकर हुए झगड़े और कानूनी विवाद, जिनमें धारा 307 तक के मामले दर्ज हुए थे, अब भी इस विवाद को गहराते हैं।3. जनता से अतिरिक्त शुल्क वसूली: पूर्व में झूलों पर जनता से अधिक पैसे वसूलने की घटनाओं ने पारदर्शिता के प्रति विश्वास को कमजोर किया।नगर पालिका परिषद और प्रशासन की भूमिकानगर पालिका परिषद, जो जनता के प्रतिनिधियों से बनी है, मेले के आयोजन से जुड़े सभी निर्णय सामूहिक सहमति से करती है। परिषद का कहना है कि सर्वसम्मति से पारित प्रस्तावों को चुनौती देना प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।राजनीति बनाम परंपरा: कौन होगा विजयी?इस विवाद में एक और पहलू यह है कि नगर पालिका परिषद के फैसलों को चुनौती देना न केवल कानूनी पचड़े को जन्म देता है, बल्कि मेले की मूल भावना को भी आहत करता है। प्रशासन की पुनर्विचार की सिफारिशें और राजनीतिक दबाव आयोजन की प्रक्रिया को बाधित कर रहे हैं।झूलों का खेल: इतिहास के पन्नों में छिपे विवादपिछले वर्षों पर नजर डालें तो झूलों से जुड़े विवाद कोई नई बात नहीं हैं। मारपीट और कानूनी मामले, मेले के दौरान अनुशासनहीनता और जनता से अधिक पैसे वसूले जाने की शिकायतें। इन सबके कारण परिषद ने पहले ही झूलों के आवंटन को सख्त नियमों में बांधा था।मेला: जनता की उम्मीदों का प्रतीकमध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के लिए यह मेला केवल व्यापार या मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सामाजिक मेलजोल का जरिया है। यहां के झूले, दुकानें और सांस्कृतिक कार्यक्रम उन लोगों के लिए खुशियों का संदेश लेकर आते हैं, जिनके पास मनोरंजन के साधन सीमित हैं।समाप्ति: परंपरा को बचाने की पुकारनौगांव का मेला केवल झूलों और दुकानों का मेला नहीं है, यह एक सांस्कृतिक धरोहर है, जो पीढिय़ों से लोगों के दिलों में बसी है। राजनीति और स्वार्थ के इस जाल से इसे बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। क्योंकि यह मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि जनमानस के सपनों और उत्सवों का दर्पण है। अब यह वक्त पर निर्भर करता है कि परंपरा और राजनीति की इस लड़ाई में विजयी कौन होगा—जनता की खुशी या निजी स्वार्थ।








