
मन की पवित्रता के लिए साधना आवश्यक – कौशिक जी
छतरपुर। परमात्मा की कृपा और गुरु का आर्शीवाद मन की पवित्रता से प्राप्त होता है। जिस तरह बिन वृक्ष के फल की प्राप्ति नहीं होती उसी तरह मन की पवित्रता के बिना भगवत कृपा प्राप्त नहीं होती है। ये उद्गार चेतगिर मंदिर मेें चल रही भागवत कथा में मंगलवार को भगवती प्रसाद जी कौशिक ने प्रकट किए। उन्होंने कहा कि जिन-जिन संतों ने साधना के द्वारा अपने मन को पवित्र किया है आज उन्हीं परम् साधकों को स्मरण किया जाता है वे चाहे सूरदास जी हो या कबीरदास जी, तुलसीदास जी हो या रैदास जी।आचार्य श्री ने मनु-कर्दम संवाद पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कर्दम महाराज ने दस हजार वर्ष तक कठिन साधना की। जिससे प्रसन्न होकर परमात्मा स्वयं उनके यहां पुत्र कपिल के रूप में अवतरित होकर उन्हें विभिन्न शास्त्रों का उपदेश दिया। जिसके फलस्वरूप श्री कर्दम जी को परम पद प्राप्त हुआ।श्री कौशिक जी कहते हैं कि सत्संग से धर्म, अर्थ और काम के साथ-साथ मोक्ष भी प्राप्त होता है। कलयुग में श्रीनाम भगवान की सेवा ही प्रधान सेवा है। भगवान को भक्त से कुछ नहीं चाहिए प्रेमाभक्ति से ही भगवान प्रसन्न होते हैं। आचार्य श्री गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि प्राणी जब इस संसार सागर में जन्म लेता है तब वह प्रभु की माया के द्वारा ग्रसित होकर भटकने लगता है। ऐसे समय में प्राणी को सच्चे गुरू अथवा सच्चे संत की आवश्यकता होती है ताकि उनके सानिध्य में रहकर, सत्संग कर, शान्ति का अनुभव कर सके।श्रीमहाराज ने कहा कि श्री वेदव्यास जी ने पुराण, उपपुराण, महाभारत आदि ग्रंथों की रचना की। किन्तु उन्हें फिर भी शांति प्राप्त नहीं हुई। तभी तो श्रीनारद जी ने कहा जब तक सत् स्वरूप परमात्मा के लिए कुछ नहीं करते है तब तक प्राणी को शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इसलिए आपको भी परमात्मा के लिए विशेष ग्रंथ प्रकाशित करना होगा। श्रीनारद जी से यह सुनकर श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत पुराण की रचना की और उनके मन ने अपार शान्ति का अनुभव किया। भागवत कथा के तीसरे दिन बुधवार को गजेन्द्र मोक्ष, वामन अवतार और समुद्र मंथन की कथा होगी। आप सपरिवार पधारकर इस कथा का आनंद अवश्य उठाएं।








