
बुंदेलखंड परिवार द्वारा आयोजित श्री राम कथा के पहले दिन का प्रवचन
छतरपुर। संसार में रामराज्य से बड़ी कोई व्यवस्था नहीं है,सनातन संस्कृति में रामराज्य से आशय सबका सुख, सम्मान, सृजन, शांति, आनंद और विकास है। भक्ति के स्वरूप विषय पर बुंदेलखंड गेराज में आयोजित सात दिवसीय राम कथा के पहले दिन श्री रामकिंकर विचार मिशन के संस्थापक संत मैथिली शरण भाई जी ने कहा कि रामचरितमानस में भक्ति विषयक ही चर्चा है। रावण भगवान राम को सठ कहता है परंतु राम ने रावण को कभी सठ नहीं कहा। परिणाम स्वरुप लंका का दहन हो जाता है और राम राज्य की स्थापना।
कथा आयोजक जय नारायण अग्रवाल की बेटी ऋचा अग्रवाल रायपुर द्वारा व्यास पीठ का पूजन, लखन लाल असाटी द्वारा स्वागत उद्बोधन तथा संजू द्वारा अमृत वचन पाठ किया गया। शीत लहर के बावजूद भारी संख्या में राम रसिक श्रोता उपस्थित रहे। मैथिलीशरण जी ने कहा कि भगवान दूसरों में दोष नहीं देखते हैं। दोष में भी गुण देखना भगवान राम का स्वभाव है, जबकि गुण में दोष देखना रावण की प्रवृत्ति है। बाली के भय से बार-बार भाग कर सुरक्षित ठिकाना खोजने वाले सुग्रीव से मैत्री करने पर प्रभु श्री राम से किसी ने पूछ लिया कि आपने सुग्रीव में ऐसा कौन सा गुण देखा है जो उसे अपना मित्र बना लिया। भगवान राम ने मुस्करा कर कहा कि सुग्रीव भागने और खोजने में निपुण है और उसका यही गुण सीता जी की खोज में सहायक बनेगा। विभीषण की शरणागति प्रसंग की तात्विक विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि सुग्रीव विभीषण को भेदिया जानकर उसे बांध लेने की सलाह देते हैं। परंतु कृपालु श्री राम विभीषण को अपनी बाहों के बंधन में बांध लेते हैं, जो प्रभु के हृदय से लग गया है अब उसके लिए क्या कुछ और पाना बाकी रह गया है। वास्तव में रावण भेदिए के रूप में विभीषण के पीछे-पीछे पहुंचे सुक और सारंग भी भगवान के चरित्र को देखकर उनका प्रकट रूप से गुणगान करने लगे, भगवान उपदेश भी अपने चरित्र के माध्यम से देते हैं, प्रभु के गुणगान से उनके हृदय की बुराई समाप्त हो गई, सत्संग का परिणाम यही होता है कि हृदय शुद्ध बुद्ध हो जाता है। गरुण जी भी यही कहते हैं कि भगवान के प्रति उनका संदेह तो कागभुसुंडि जी के आश्रम में प्रवेश करते ही समाप्त हो गया था। उपलब्धि में भी भगवत स्मृति बनी रहना भक्त के लक्षण
संत श्री मैथिलीशरण जी ने भक्ति और भक्त को परिभाषित करते हुए कहा कि जीवन में जो भी उपलब्धि और प्राप्ति हो रही है उसके पीछे भगवान की कृपा को देखना ही भक्ति है। सुख और दुख दोनों ही पाप और पुण्य का परिणाम हो सकते हैं। सुख मिलते समय यदि भगवान की स्मृति बनी रहती है तो समझ लीजिए यह पुण्य का परिणाम है पर यदि सुख मिलते समय भगवान विस्मृत हो जाए तो यह पाप का परिणाम ही होगा। भगवान ही आनंद के सिंधु और सुख की राशि है, संसार में जो विषय आनंद देते हैं वही बाद में फ्रस्ट्रेशन बनते हैं। अंदर के आनंद को आंख बंद कर ध्यान और एकाग्र होकर देखने का अभ्यास करें। उन्होंने अपनी ग्वालियर यात्रा का रोचक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि राम कथा पंडाल में अधिकतर वृद्धजन ही शामिल थे परंतु अगले दिन जब वह प्रवचन करने जेल गए तो वहां अधिकतर युवा थे। आनंद लेने वाले कथा में थे जबकि मजा लेने वाले जेल में। यदि युवाओं ने कथा सुनी होती तो जेल खाली होती। कथा प्रवचन में युवाओं की कम उपस्थिति पर मैथिली शरण जी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि कागभूसुंडी से कथा सुनने भी वृद्ध विहंग ही अधिकतर पहुंचते हैं, पर मैं तो उम्मीद करता हूं कि आज के युवा जब वृद्ध होंगे तब तो राम कथा सुनाने आएंगे ही।
भक्ति भाव से होगी बुद्धि से नहीं
संत श्री मैथिलीशरण जी ने कहा कि वक्ता बुद्धि से बोलता है परंतु भगवान भाव से सुनते हैं इसे संवाद कहते हैं। परंतु कोई भाव से अपनी बात कहे और उसे दूसरा बुद्धि से सुने तो यही विवाद बनता है, राम कथा के चार मनोहर घाट हैं भक्ति घाट के वक्ता शंकर जी हैं कर्म घाट के वक्ता याज्ञावल्क ऋषि हैं। ज्ञान घाट के वक्ता कागभूसुंडी जी है और शरणागति घाट के वक्ता गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, पर कथा समापन पर सभी कहते हैं कि उनकी जितनी मति थी उतना उन्होंने बता दिया वस्तुत: तो हरि अनंत हरि कथा अनंता है, तात्पर्य यह है कि संसार में संत और भक्त अपना अहंकार रखते ही नहीं है वह तो सबके अंदर भगवान ही देखते हैं, बाली वध की तात्विक विवेचना करते हुए मैथिलीशरण जी ने कहा कि अंत समय बाली ने अपने शरीर रूपी अहंकार को प्रभु श्री राम के चरणों में तथा पुत्र रूपी ममता को भगवान के हाथ में सौंप दिया, जो प्राप्त नहीं है उसका योग और जो प्राप्त है उसका संरक्षण दोनों ही प्रभु राम से जोड़ दिए, उन्होंने कहा कि भाव शुद्धि का आधार भक्ति है। भक्ति से विचारों पर ध्यान जाता है जिससे सात्विक सृजन होता है।
राम कथा नियमित रूप से शाम 6 से 8बजे के बीच चल रही है। प्रारंभ में संगीत मय भजन मिंटू महाराज, विक्रम एवं शिवम द्वारा किए जाते हैं। श्रीकांत शास्त्री जी द्वारा पूजन और ध्यानी जी द्वारा सहयोग किया जा रहा है।








