
देशभक्ति और हास्य व्यंग्य से सराबोर होगा आयोजन
छतरपुर। शहर के किशोर सागर तालाब के पास स्थित ऑडिटोरियम में आगामी 26 नवंबर से 30 नवंबर 2024 तक 5 दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन भारत उदय सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा किया जा रहा है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा अनुदान योजना के तहत इस नाट्य महोत्सव का आयोजन नाट्य प्रेमियों के लिए किया जाएगा जो कि पूर्णत: नि:शुल्क रहेगा।इन नाटकों की होगी प्रस्तुतिशहर में इन दिनों रंगमंच के क्षेत्र में लगातार कार्य किया जा रहा है। वरिष्ठ रंगकर्मी शिवेन्द्र शुक्ला ने जानकारी देते हुए बताया कि इस पांच दिवसीय नाट्य समारोह में भोपाल, औरैया, रीवा, सागर सहित अन्य जगहों से आए नाट्य कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। इन पांच दिनों के दौरान 6 नाटकों की प्रस्तुति होगी। पहले दिन 26 नवंबर को सतीश दवे द्वारा लिखित नाटक अबुआ दिसुम अबुआ राज (बिरसा मुण्डा) नाटक की प्रस्तुति राजकुमार रायकवार के निर्देशन में की जाएगी। गौरतलब है कि 15 नवंबर को ही आदिवासियों के भगवान बिरसा मुण्डा की जन्मतिथि थी। रोंगटे खड़े कर देने वाला यह नाटक उन्हीं को समर्पित है। अगले दिन 27 नवंबर को मशहूर व्यंग्य लेखक प्रेम जन्मेजय द्वारा लिखित नाटक सोते रहो का मंचन तरूण दत्त पाण्डेय भोपाल के द्वारा किया जाएगा। समाज की व्यवस्थाओं पर कटाक्ष करता यह नाटक लोगों को सोचने पर विवश करता है। समारोह की अगली प्रस्तुति के रूप में सुनील मिश्र का लिखा और आनंद मिश्र द्वारा निर्देशित नाटक ऐसे रहो कि धरती के तौर पर होगा। 29 नवंबर को 2 नाटकों की प्रस्तुति होगी जिसमें मुंबई की मशहूर प्ले राईट नादिरा बब्बर के लिखे नाटक दयाशंकर की डायरी की एकल नाट्य प्रस्तुति औरैया निवासी और मप्र नाट्य विद्यालय के पूर्व छात्र अखण्ड शर्मा द्वारा दी जाएगी। इसी दिन दयाप्रकाश सिन्हा का लिखा नाटक प्रेमकथा रचना मिश्रा के निर्देशन में होगा। कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति मप्र के वरिष्ठ रंगनिर्देशक एवं शिखर सम्मान तथा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त अलखनंदन के निर्देशन में होगी। इस नाटक के लेखक भी अलखनंदन हैं तो वहीं नाटक में नृत्य निर्देशन पद्मश्री पं. रामसहाय पाण्डेय का है। वहीं संगीत प्रभाव वरिष्ठ रंगनिर्देशक ब व कारन्त का होगा। बुन्देलखण्ड की पृष्ठभूमि पर आधारित इस नाटक का निर्माण सागर के कनेरादेव गांव में आयोजित एक थिएटर कार्यशाला में किया गया था। यह एक लोककथा को भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक तनाव के नाटक में सार्वभौमिक बनाने की एक कोशिश करता है जिसने समाज को त्रस्त करके रख दिया है।









